From Kirana Hills to Today: Why Pakistan’s Nuclear Threat Lacks Bite
1980 के दशक के आखिर में पाकिस्तान ने पंजाब प्रांत के सरगोधा ज़िले के पास स्थित किराना हिल्स में गुप्त रूप से परमाणु हथियारों के परीक्षण की तैयारी की थी। इन परीक्षणों का उद्देश्य भारत के खिलाफ रणनीतिक बढ़त हासिल करना था। हालांकि, उस समय यह गतिविधि गुप्त रखी गई थी, लेकिन बाद में अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों और विश्लेषणों ने इसे उजागर कर दिया।
पाकिस्तान की परमाणु नीति हमेशा से “डिटरेंस” यानी प्रतिरोध की रणनीति पर आधारित रही है। पाकिस्तान बार-बार भारत को परमाणु हमले की धमकी देता रहा है, खासकर जब सीमा पर तनाव बढ़ता है। लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह धमकी ज़्यादातर राजनीतिक दबाव बनाने और अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने के लिए होती है।
भारत के पास इस समय लगभग 160 से ज्यादा परमाणु वारहेड माने जाते हैं, जबकि पाकिस्तान के पास भी करीब 170 के आसपास होने का अनुमान है। लेकिन फर्क सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि डिलीवरी सिस्टम, तकनीक और सुरक्षा प्रोटोकॉल में भी है, जहां भारत की क्षमता कहीं ज्यादा उन्नत और भरोसेमंद मानी जाती है।
भारत के पास Agni और Prithvi सीरीज के मिसाइलों के साथ-साथ समुद्र से लॉन्च होने वाले परमाणु हथियार भी हैं, जो ‘ट्रायड’ क्षमता प्रदान करते हैं। इसका मतलब है कि भारत ज़मीन, हवा और समुद्र — तीनों से परमाणु हमले की क्षमता रखता है। वहीं पाकिस्तान की क्षमता मुख्य रूप से ज़मीनी लॉन्च सिस्टम तक सीमित है, जो उसकी रणनीतिक लचीलापन कम कर देता है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद जैसे आंतरिक संकट उसकी परमाणु नीति की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई जाती है, खासकर गैर-राज्य तत्वों के हाथ लगने का खतरा।
नतीजा यह है कि पाकिस्तान की धमकी जितनी जोरदार सुनाई देती है, उतनी व्यवहारिक नहीं मानी जाती। भारत की जवाबी क्षमता और वैश्विक कूटनीतिक स्थिति पाकिस्तान को वास्तविक परमाणु संघर्ष की ओर बढ़ने से रोकती है। इसीलिए, किराना हिल्स से लेकर आज तक, पाकिस्तान की परमाणु धमकी अधिकतर शब्दों तक सीमित रही है, ज़मीनी हकीकत में नहीं।